-यह निर्णय भारत की सांस्कृतिक चेतना, सत्य एवं सनातन परंपरा की पुष्टिः आलोक कुमार
एसएस ब्यूरो/ नई दिल्लीः 15 मई 2026।
विश्व हिन्दू परिषद के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष वरिष्ठ अधिवक्ता आलोक कुमार ने मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय द्वारा भोजशाला संबंधी प्रकरण में दिए गए ऐतिहासिक निर्णय का स्वागत करते हुए कहा है कि यह निर्णय भारत की सांस्कृतिक चेतना, सत्य एवं सनातन परंपरा की महत्वपूर्ण पुष्टि है।
मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की खंडपीठ ने यह निर्णय दे दिया है कि धार की भोजशाला हिन्दू मंदिर है। न्यायालय ने कहा कि सैदव ही भोजशाला के पूजा स्थान की पद्द्ति हिन्दू मंदिर की रही है। न्यायालय के निर्णय से भोजशाला में अब निरंतर पूजा का हिन्दुओं को अधिकार मिल गया है। मुसलमानो के लिए भी यह कहा गया है कि वह सरकार से मस्जिद के लिए जगह मांग सकते है।
हम यह अपेक्षा करेंगे कि भोजशाला केवल मां वाग्देवी की पूजा का स्थान न रहे अपितु पुरातन काल की तरह संस्कृत और धर्मशास्त्रों के अध्ययन का एक वैश्विक केंद्र बने। यह काम समाज और सरकार को मिलकर करना होगा। इस स्थान की ऊर्जा से पुरे जगत में आध्यात्मिक ज्योति फैलेगी।
उन्होंने कहा कि यह फैसला पूरी न्यायायिक पद्धति का पालन करके हुआ है। कोर्ट ने उस ।ैप् को जांच करने के लिए नियुक्त किया था जो इस बारे में भारत की सबसे विशेषज्ञ संस्था है। जांच की प्रतिलिपि दोनों पक्षों को दी गयी। दोनों पक्षों को अपना मत रखने के लिए पर्याप्त समय दिया। विद्वान न्यायाधीशों ने स्वयं मौके पर जाकर उस भवन का निरिक्षण भी किया।
आलोक कुमार ने यह भी कहा कि इस प्रकार से एक वैज्ञानिक विशलेषण करवाने के बाद, सबको सुनकर और प्रत्यक्ष भवन को देखने के बाद यह निर्णय आया है। माननीय उच्च न्यायालय ने उपलब्ध ऐतिहासिक साहित्य, पुरातात्विक साक्ष्यों एवं सतत हिन्दू उपासना की परंपरा के आधार पर यह स्पष्ट रूप से माना है कि भोजशाला देवी वाग्देवी माँ सरस्वती का प्राचीन मंदिर एवं संस्कृत शिक्षा का केंद्र था। यह निर्णय केवल एक स्थल से जुड़ा विषय नहीं, बल्कि भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा, सांस्कृतिक विरासत और सभ्यतागत अस्मिता से जुड़ा हुआ है। यह निर्णय संतुलित है, अच्छा है। सब लोगो को यह निर्णय स्वीकार करना चाहिए।
उन्होंने न्यायालय द्वारा केंद्र सरकार को लंदन के ब्रिटिश म्यूजियम में स्थापित माँ सरस्वती की प्रतिमा को भारत वापस लाने हेतु प्रस्तुत अभ्यावेदनों पर विचार करने संबंधी टिप्पणी का भी स्वागत किया और कहा कि यह प्रतिमा भारत की सांस्कृतिक आत्मा का प्रतीक है, जिसे उसके मूल स्थान भोजशाला में पुनः स्थापित किया जाना चाहिए।
आलोक कुमार ने यह भी कहा कि यह विषय किसी के हार या जीत का नहीं है। हम सभी को न्यायालयों के आदेशों एवं संवैधानिक प्रक्रियाओं का सम्मान करना चाहिए। उन्होंने सभी पक्षों से शांति, सौहार्द एवं सामाजिक समरसता बनाए रखने की अपील करते हुए कहा कि यह निर्णय किसी समुदाय की पराजय नहीं, बल्कि ऐतिहासिक सत्य एवं सांस्कृतिक न्याय की पुनर्स्थापना है। उन्होंने आशा व्यक्त की कि केंद्र सरकार, राज्य सरकार एवं भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण इस निर्णय के अनुरूप भोजशाला मंदिर के संरक्षण, व्यवस्थापन एवं संस्कृत अध्ययन की गौरवशाली परंपरा के पुनर्जीवन हेतु शीघ्र आवश्यक कदम उठाएंगे।


