-कविता की भाषा का भी किया गया आयोजन
एसएस ब्यूरो/ नई दिल्ली 4 नवंबर।
दिल्ली विश्वविद्यालय के कला संकाय में ‘रचयिता फाउंडेशन’ की ओर से आयोजित दो दिवसीय ‘रचयिता साहित्य उत्सव’ का सफलतापूर्वक समापन हुआ। उत्सव में लोक, साहित्य, भाषा, स्त्री-विमर्श, गांधीवादी विचार, राष्ट्रीय अस्मिता, कविता, रील्स के दौर में पुस्तकों की बदलती भूमिका और पत्रकारिता जैसे विषयों पर व्यापक चर्चा हुई। दिल्ली विश्वविद्यालय के प्राध्यापकों, शोधार्थियों, विद्यार्थियों, साहित्यकारों और पत्रकारिता विशेषज्ञों ने कार्यक्रम में भाग लिया। दिल्ली विधानसभा के अध्यक्ष विजेंद्र गुप्ता, हंसराज कॉलेज की प्राचार्या प्रो. रमा, अनूप लाठर, प्रो. रंजन त्रिपाठी एवं रोजगार विथ अंकित के प्रतिनिधि अमर चौधरी ने दीप प्रज्ज्वलन करके कार्यक्रम का उद्घाटन किया।
उत्सव के पहले सत्र ‘साहित्य का लोक और लोक का साहित्य’ में प्रो. मंजू मुकुल कांबले ने कविताओं के माध्यम से लोक, भाषा और साहित्य के संबंधों को रेखांकित किया और कहा कि साहित्य लोकजीवन के अनुभवों और संवेदनाओं से जन्म लेकर समाज को समृद्ध करता है। प्रो. अनूप लाठर ने हिंदी और उर्दू सहित भाषाओं के उद्गम पर चर्चा करते हुए कहा कि भाषाओं की जड़ों में लोकभाषाओं की अहम भूमिका रही है और लोकभाषाएं अब स्थानीय सीमाओं से निकलकर वैश्विक पहचान बना रही हैं। सत्र का संचालन उत्तम कुमार ने किया।
‘कविता की भाषा’ सत्र में प्रो. रामेश्वर ने कहा कि कविता की भाषा को व्याकरण, शब्दावली, पारंपरिक शिल्प या आलोचना के तय मानकों में सीमित नहीं किया जा सकता। नई पीढ़ी की बोलचाल, स्लैंग और नए भाषिक प्रयोगों को भी उनके अनुभव के संदर्भ में समझना चाहिए।
स्त्री विमर्श पर केंद्रित सत्र ‘स्त्री का राष्ट्र’ में प्रो. भारती गोरे ने कहा कि नारीवाद महिलाओं को कमजोर नहीं, बल्कि सशक्त बनाता है। प्रो. वंदना झा ने अहिल्याबाई होलकर जैसी महिलाओं का उदाहरण देते हुए स्त्री की नेतृत्व क्षमता और समाज को दिशा देने की भूमिका पर प्रकाश डाला।
एक अन्य सत्र में पंडित दीनदयाल उपाध्याय के एकात्म मानव दर्शन पर चर्चा हुई, जिसमें वक्ता डॉ. महेश चंद्र शर्मा और संचालक अनिल राजगढ़ रहे। शर्मा ने कहा कि इसे केवल अनेक विचारधाराओं में से एक मानना उचित नहीं, बल्कि यह भारतीय जीवन-पद्धति में सहज रूप से दिखाई देने वाली दृष्टि है, जिसे सामान्य व्यक्ति के दैनिक अनुभवों के माध्यम से समझा जाना चाहिए।
‘अस्मिताओं के बीच राष्ट्र’ सत्र में प्रो. श्योराज सिंह बेचैन, डॉ. गंगा सहाय मीणा और जयप्रकाश कर्दम ने विचार रखे।


