दिल्ली विश्वविद्यालय के 28 कॉलेजों में नहीं बनी गवर्निंग बॉडी

-फोरम ऑफ एकेडेमिक्स फॉर सोशल जस्टिस ने उठाई मांग
विजय कुमार/ नई दिल्ली 13 मई।
फोरम ऑफ एकेडेमिक्स फॉर सोशल जस्टिस ( शिक्षक संगठन ) के चेयरमैन प्रोफेसर हंसराज सुमन ने दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता व शिक्षा मंत्री आशीष सूद को पत्र लिखकर मांग की है कि दिल्ली सरकार से वित्त पोषित 28 कॉलेजों की गवर्निंग बॉडी बनाने के लिए दिल्ली विश्वविद्यालय के कुलपति/ कुलसचिव को नाम भेजने की मांग की है। ताकि दिल्ली सरकार से पूर्ण वित्त पोषित 12 कॉलेजों में प्रबंध समिति (गवर्निंग बॉडी) बनने के बाद यहाँ पर भी शिक्षकों की स्थायी नियुक्ति की प्रक्रिया शुरू की जा सके। उन्होंने बताया कि दिल्ली सरकार का गठन हुए 16 महीने बीत चुके हैं लेकिन अभी तक दिल्ली सरकार के 28 कॉलेजों में गवर्निंग बॉडी नहीं बनी है। बता दें कि दिल्ली सरकार से पूर्ण वित्त पोषित 12 कॉलेजों में लगभग 1000 शिक्षकों की स्थायी नियुक्ति की जानी है। इन कॉलेजों में जहाँ दिल्ली सरकार व प्रबंध समिति (गवर्निंग बॉडी) ने 1512 पदों को स्वीकृत किया है, लेकिन यहाँ स्थायी शिक्षकों की संख्या 528 है। इसके अलावा पिछले छह वर्षों में शिक्षक सेवानिवृत्त व एडहॉक से स्थायी होकर दूसरे कॉलेजों / विश्वविद्यालयों में चले गए हैं।
दिल्ली सरकार के इन कॉलेजों में से अभी तक चार कॉलेज- अदिति महाविद्यालय, भाष्कराचार्य कॉलेज, दीनदयाल उपाध्याय कॉलेज व आचार्य नरेंद्रदेव कॉलेज ने शिक्षकों के पदों को भरने के लिए विज्ञापन जारी कर चुकी हैं। बाकी कॉलेजों ने अभी तक अपना रोस्टर पास नहीं कराया है, रोस्टर पास होने के बाद ही पदों को विज्ञापित किया जाता है। इन कॉलेजों में ट्रेंकेडिड गवर्निंग बॉडी कार्य कर रही है जो शैक्षिक व गैर-शैक्षिक स्तर के सभी मामलों की देखरेख करती है।
प्रोफेसर सुमन ने एससी/एसटी व ओबीसी समुदाय के लोगों को उचित प्रतिनिधित्व दिए जाने व आरक्षण के हिसाब से प्रबंध समिति (गवर्निंग बॉडी) में रखे जाने की भी मांग की है। साथ ही इन समुदायों के लोगों को कॉलेजों की प्रबंध समिति में चेयरमैन/ कोषाध्यक्ष भी बनाया जाए। प्रोफेसर सुमन ने इस संदर्भ में दिल्ली विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर योगेश सिंह से भी मांग की है कि जब तक दिल्ली सरकार अपने वित्त पोषित 28 कॉलेजों में एससी, एसटी व ओबीसी समुदाय के लोगों के नाम नहीं भेजती तब तक उनके पूर्ण वित्त पोषित 12 कॉलेजों में प्रबंध समिति गठित न की जाए। उन्होंने बताया कि आरक्षण के हिसाब से इन कॉलेजों में चेयरमैन व कोषाध्यक्ष के पद अनुसूचित जाति- 4, अनुसूचित जनजाति- 2 व ओबीसी-8 पद बनते हैं। पूर्व की सरकारों ने इन वर्गों को उचित प्रतिनिधित्व देते हुए इन वर्गों का सम्मान किया है।
फोरम के चेयरमैन प्रोफेसर हंसराज सुमन ने मुख्यमंत्री व शिक्षामंत्री को भेजे गए प्रस्ताव में बताया कि दिल्ली सरकार से संबद्ध 28 कॉलेजों की गवर्निंग बॉडी का कार्यकाल तीन साल पहले समाप्त हो चुका है। दिल्ली में नई सरकार बन चुकी है अब इन कॉलेजों की नई गवर्निंग बॉडी बनाने के लिए दिल्ली विश्वविद्यालय प्रशासन दिल्ली सरकार से अपने कॉलेजों में गवर्निंग बॉडी बनाने के लिए नाम मांगे जाने के लिए लिखे। उन्होंने बताया कि दिल्ली सरकार के इन कॉलेजों में दिल्ली सरकार की ओर से लगभग-180 लोगों की सूची भेजी जाती है जिसमें से विश्वविद्यालय प्रशासन-144 लोगों को गवर्निंग बॉडी में स्थान देती है। बता दें कि दिल्ली सरकार के जिन कॉलेजों में प्रातः व सांध्य है वहाँ पर 6 सदस्य दिल्ली सरकार से व 6 सदस्य विश्वविद्यालय प्रशासन की ओर से होते हैं। इसके अलावा विश्वविद्यालय से दो वरिष्ठ प्रोफेसर , कॉलेज प्रिंसिपल के अतिरिक्त दो शिक्षक, एक जूनियर व एक सीनियर होते हैं। इसके बाद विश्वविद्यालय की सर्वोच्च संस्था कार्यकारी परिषद (ईसी) में नामों को स्वीकृत कर कॉलेजों को लिस्ट भेज दी जाती है, उस लिस्ट में से ही चेयरमैन व कोषाध्यक्ष बनाए जाते हैं।
प्रोफेसर सुमन ने शिक्षा मंत्री को लिखे पत्र में यह भी मांग की दिल्ली सरकार अपने कॉलेजों में आरक्षण के हिसाब से एससी/ एसटी व ओबीसी समुदाय के लोगों को उचित प्रतिनिधित्व देते हुए एससी- 22, एसटी- 11 व ओबीसी- 39 सदस्यों को गवर्निंग बॉडी में स्थान दे। साथ ही दिल्ली देहात के कॉलेजों में ग्रामीण क्षेत्र के ही प्रतिनिधि भेजे जाएं क्योंकि देखने में आया है कि दिल्ली सरकार की ओर से जिन सदस्यों को भेजा जाता है उन्हें ग्रामीण परिवेश की कोई जानकारी नहीं होती। साथ ही शैक्षिक व गैर-शैक्षिक नियुक्तियों के समय गांवों के लोगों को उचित प्रतिनिधित्व नहीं दिया जाता है। जबकि वे कॉलेज गाँव की जमीनों में बने हुए हैं और दिल्ली सरकार ने जमीन लेते समय ग्राम पंचायतों से कहा था कि छात्रों को प्रवेश, शिक्षक व कर्मचारियों को नियुक्तियों के समय उन्हें उचित प्रतिनिधित्व दिया जाएगा लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों की प्रतिभाओं को कोई सम्मान नहीं दिया जाता।