पेट्रो समस्या और आज का भारत

-तेल की समस्या से पहले भी रूबरू हो चुका है भारत

-बृजेश कुमार द्विवेदी

भारत ने ऊर्जा अस्थिरता का दौर पहले भी देखा है। विशेष रूप से 1973 में तेल समस्या के समय, जब तेल उत्पादक देशों द्वारा आपूर्ति सीमित कर दी गई थी, दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाएं हिल गईं थीं। उस दौर में भारत आयात पर निर्भर था और देश के पास न तो पर्याप्त भंडारण था और न ही विविध आपूर्ति के स्रोत थे इसलिए गंभीर दबाव में आ गया था। तब महंगाई बढ़ी, आर्थिक विकास प्रभावित हुआ और ऊर्जा सुरक्षा की सीमाएं स्पष्ट हो गईं। लेकिन पांच दशकों में भारत की स्थिति में उल्लेखनीय परिवर्तन आया है। आज का भारत उस समय के भारत से कई मायनों में अलग है कृनीतिगत रूप से भी और संरचनात्मक रूप से भी। सबसे बड़ा बदलाव ऊर्जा स्रोतों का विविधीकरण है। अब भारत किसी एक क्षेत्र या देश पर पूरी तरह निर्भर नहीं है। मध्य-पूर्व के पारंपरिक स्रोतों के साथ-साथ रूस, अमेरिका और अन्य क्षेत्रों से आयात की नीति ने जोखिम को काफी हद तक संतुलित किया है। यह रणनीति वैश्विक संकटों के प्रभाव को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
सबसे महत्वपूर्ण पहलू रिफाइनिंग क्षमता का विस्तार है। भारत आज न केवल अपनी जरूरतों को पूरा करने में सक्षम है, बल्कि पेट्रोलियम उत्पादों के निर्यात में भी महत्वपूर्ण स्थान रखता है। इससे आपूर्ति श्रृंखला अधिक लचीली और सुदृढ़ बनी है। इसके साथ ही भारत ने रणनीतिक तरीके से पेट्रोलियम भंडार को सुदृढ किया है। अतीत में इसकी अनुपस्थिति ने संकट को गहरा किया था, लेकिन आज भारत ने आपात स्थितियों से निपटने के लिए भंडारण की मजबूत व्यवस्था विकसित की है। यह किसी भी अचानक वैश्विक झटके के समय देश को आवश्यक समय और स्थिरता प्रदान करता है। पेरिस स्थित अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी आईईए ने कहा कि संघर्ष के कारण वैश्विक तेल बाजार के इतिहास में सबसे बड़ी आपूर्ति बाधा उत्पन्न हुई है, जो 1970 के दशक के संकट को भी पार कर गई है।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने लोकसभा में अपने अपने संबोधन में स्ट्रेट ऑफ होर्मुज का उल्लेख किया, जो वैश्विक तेल व्यापार की सबसे महत्वपूर्ण जीवन रेखा मानी जाती है। भारत अपनी जरूरत का एक बड़ा हिस्सा इसी समुद्री रास्ते से मंगवाता है। युद्ध की वजह से इस रास्ते पर जहाजों का आवागमन बेहद चुनौतीपूर्ण और जोखिम भरा हो गया है। चूंकि भारत अपनी जरूरत की 60 प्रतिशत एलपीजी का आयात करता है, इसलिए आपूर्ति में जरा सी भी अनिश्चितता देश के करोड़ों रसोईघरों के बजट को बिगाड़ सकती है। सरकार का मुख्य फोकस इसी बात पर है कि युद्ध के बावजूद सामान्य परिवारों तक गैस और पेट्रोल-डीजल की पहुंच बाधित न हो।
गैस क्षेत्र में देश ने उल्लेखनीय प्रगति की है। पाइपलाइन नेटवर्क का विस्तार, स्छळ टर्मिनलों की स्थापना और सिटी गैस वितरण व्यवस्था ने ऊर्जा की पहुंच को अधिक व्यापक और विश्वसनीय बनाया है। फिर भी, यह मान लेना कि भारत पूरी तरह सुरक्षित है, यह भी उचित नहीं होगा। देश अभी भी अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है और अंतरराष्ट्रीय कीमतों का असर घरेलू बाजार पर पड़ता ही है। युद्ध और भू-राजनीतिक तनाव वैश्विक आपूर्ति को प्रभावित कर सकते हैं, जिससे कीमतों में अस्थिरता बनी रह सकती है। यही कारण है कि आत्मनिर्भरता और वैकल्पिक ऊर्जा पर जोर पहले से अधिक महत्वपूर्ण हो गया है। ओएनजसी समेत पेट्रो से सम्बंधित संस्थाओं के माध्यम से घरेलू उत्पादन बढ़ाने के प्रयास और सौर, पवन तथा ग्रीन हाइड्रोजन जैसे विकल्पों में निवेश, भविष्य की ऊर्जा सुरक्षा की दिशा तय करेंगें। आज का भारत 1970 के दशक के संकटग्रस्त भारत से कहीं अधिक सक्षम, सजग और तैयार है। प्रधानमंत्री का आश्वासन इसी बदले हुए परिदृश्य का संकेत है।
किसी भी आपात स्थिति से निपटने के लिए भारत ने जमीन के नीचे कच्चे तेल का विशाल भंडार तैयार किया है, जिसे स्ट्रेटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व जिसे एसपीआर कहा जाता है। वर्तमान में भारत के पास 53 लाख मीट्रिक टन से ज्यादा कच्चा तेल सुरक्षित रखा हुआ है। यह भंडार मुश्किल वक्त में देश की लाइफलाइन साबित हो सकता है। इसके अलावा, सरकार 65 लाख मीट्रिक टन की अतिरिक्त भंडारण क्षमता विकसित करने पर भी तेजी से काम कर रही है। यह सरकारी रिजर्व तेल कंपनियों के पास मौजूद अपने निजी स्टॉक से बिल्कुल अलग है, जो केवल राष्ट्रीय संकट के समय इस्तेमाल के लिए सुरक्षित रखा गया है।
संसद में प्रधानमंत्री ने ये भी बताया कि सरकार न केवल मौजूदा स्टॉक को मैनेज कर रही है, बल्कि भविष्य की चुनौतियों को देखते हुए फर्टिलाइजर और कच्चे तेल के नए स्रोतों की तलाश भी कर रही है। तेल कंपनियों को भी निर्देश दिए गए हैं कि वे अपने पास पर्याप्त बफर स्टॉक बनाए रखें, ताकि किसी भी अल्पकालिक बाधा का असर आम जनता पर न पड़े। आज की वैश्विक परिस्थितियों में किसी भी देश की संप्रभुता उसकी एनर्जी सिक्योरिटी यानी ऊर्जा सुरक्षा पर टिकी है। भारत जिस तरह से अपने पेट्रोलियम रिजर्व को बढ़ा रहा है और नए देशों के साथ व्यापारिक संबंध जोड़ रहा है, वह भविष्य के किसी भी बड़े तेल संकट के खिलाफ एक मजबूत ढाल है। यदि पश्चिम एशिया में तनाव और बढ़ता भी है, तो भारत के पास कई महीने तक देश चलाने के लिए पर्याप्त बैकअप प्लान मौजूद है।
वही भारत के पड़ोसी देश पाकिस्तान में पेट्रोलियम की कमी के चलते त्राहि-त्राहि मची हुई है। सरकारी कार्यालय हफ्ते में चार दिन खुल रहे हैं, पेट्रोल पंपों पर लंबी-लंबी कतारें देखी जा रही हैं, वहीं बाग्लादेश में पेट्रोल-डीजल गैस के दाम आसमान छू रहे हैं और जनता को भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है, जबकि भारत में ऐसा कुछ भी नहीं है। अंततः, यह कहना उचित होगा कि इतिहास ने भारत को सावधान रहना सिखाया है और वर्तमान ने उसे सक्षम बनाया है। यदि यही संतुलनकृसतर्कता और तैयारीकृबनी रहती है तो वैश्विक उथल-पुथल के बीच भी भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों को सुरक्षित रखने में हर कीमत पर सफल रहेगा।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)