-51 पवित्र शक्ति पीठों में शामिल है स्थान, होती है 9 ज्वालाओं की पूजा
पूनम सिंह/ नई दिल्लीः 12 जून।
हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले में स्थित एक बेहद प्रसिद्ध शक्तिपीठ है ज्वाला देवी मंदिर या ज्वाला जी मदिर। इस पवित्र स्थान पर किसी मूर्ति की पूजा नहीं होती, बल्कि सदियों से जमीन से निकल रहीं प्राकृतिक ज्वालाओं (नौ अलग-अलग ज्योतियों) की पूजा की जाती है। पौराणिक कथा के अनुसार, देवी सती अपने पिता राजा दक्ष के यज्ञ में अपने पति भगवान शिव का अपमान सहन न कर पाने के कारण हवन कुंड में कूद गई थीं। तब भगवान शिव अत्यंत क्रोधित होकर सती के मृत शरीर को लेकर तांडव करने लगे। सृष्टि के विनाश को रोकने के लिए भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर को 51 भागों में विभाजित कर दिया। जिन-जिन स्थानों पर सती के अंग गिरे, वे शक्तिपीठ कहलाए।
माना जाता है कि इस स्थान पर माता सती की जिह्वा (जीभ) गिरी थी। उसी स्थान पर माता ज्वाला एक पवित्र ज्योति के रूप में प्रकट हुईं। प्रसिद्ध ज्वाला देवी मंदिर (ज्वालामुखी मंदिर) की समुद्र तल से ऊंचाई लगभग 600 मीटर (लगभग 2,001 फीट) है। यह स्थान शिवालिक पर्वतमाला की कालीधर घाटी में स्थित है। ज्वाला माता (ज्वाला देवी) को माता सती (देवी पार्वती) और आदिशक्ति (दुर्गा) का ही साक्षात स्वरूप माना जाता है।
कुछ ऐतिहासिक वर्णनों में ऐसा उल्लेख भी है कि प्रसिद्ध ज्वालामुखी मंदिर (ज्वाला देवी मंदिर) को सिकंदर लोदी ने तोड़ दिया था। उसने मंदिर को नष्ट करके यहां स्थापित की गई मूर्तियों को कसाइयों (मांस काटने वालों) को दे दिया था। लेकिन वह प्राकृतिक रूप से निकलने वाली ज्वालाओं को नहीं रोक सका था।
राजा भूमि चंद और ध्यानु भगत की कथाः
कहा जाता है कि सदियों पहले, एक स्थानीय गड़रिये ने पहाड़ियों में लपटें निकलती देखीं और राजा भूमि चंद को इसकी सूचना दी। राजा इस दिव्य स्थान को खोजकर पहला मंदिर बनवाने वाले बने। एक अन्य प्रसिद्ध लोक कथा ध्यानु भगत की है, जो माँ के बहुत बड़े भक्त थे। मुगल काल में जब वे माता के दर्शन करने जा रहे थे, तो राजा अकबर ने उनके घोड़े का सिर काट दिया और चुनौती दी कि यदि तुम्हारी माँ में शक्ति है तो घोड़े को जीवित करे। ध्यानु भगत ने पूरी रात प्रार्थना की और चमत्कारिक रूप से आधी रात को माता ने घोड़े का सिर वापस जोड़कर उसे जीवित कर दिया। जब मुगल सम्राट अकबर को इस अद्भुत ज्वाला और ध्यानु भगत के चमत्कार का पता चला, तो उसने अपनी सेना के साथ मंदिर का रुख किया। अपनी शंका के चलते, उसने ज्वालाओं को बुझाने के लिए पूरे मंदिर में पानी डलवाया और लोहे की विशाल चादरें (तवे) रखवा दिये। लेकिन आग इतनी प्रचंड थी कि उसने सारा पानी सुखा दिया और लोहे की चादरों को भेद कर बाहर निकल आई। यह चमत्कार देख अकबर को माँ की शक्ति का पूर्ण अहसास हुआ और उसने अपनी भूल मानते हुए मंदिर में सवा मन (लगभग 50 किलो) सोने का छत्र चढ़ाया।
एक किंवदंती यह भी है कि माता को चढ़ाया गया वह सोने का छत्र बाद में किसी अन्य अज्ञात धातु में बदल गया, जिसे आज तक कोई पहचान नहीं पाया। यह मंदिर आज भी अपनी अटूट आस्था और निरंतर जलती ज्योतियों के लिए भक्तों के बीच एक प्रमुख श्रद्धा का केंद्र है।
वैज्ञानिकों की असफलताः
1970 के दशक में भारत सरकार ने गैस और पेट्रोलियम की खोज के लिए एक विदेशी कंपनी को यहाँ अनुसंधान के लिए बुलाया था, लेकिन वे भी ज्वालाओं के जलने का ठोस कारण नहीं खोज पाए। अंततः सरकार को यह कार्य बीच में ही रोकना पड़ा।
कुल देवीः
माता ज्वाला (ज्वाला देवी) को मुख्य रूप से कंछल, गुज्जर और भाटिया वंश के परिवारों की कुलदेवी मानी जाती हैं। इसके अलावा, हिमाचल प्रदेश और उत्तर भारत में यह कई अन्य परिवारों की आराध्य देवी भी हैं। (नोटः राजस्थान के जयपुर के जोबनेर में ‘ज्वाला माता’ (जालपा माता) का मंदिर है। जो मुख्य रूप से शेखावत और खंगारोत राजपूतों की कुलदेवी हैं।)
मंदिर तक पहुंचने के साधनः
हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले में स्थित ज्वाला देवी मंदिर तक पहुँचने के लिए वायु, रेल और सड़क मार्ग के बेहतरीन साधन उपलब्ध हैं। मंदिर सड़क मार्ग से अच्छी तरह जुड़ा हुआ है। दिल्ली, चंडीगढ़, और शिमला जैसे प्रमुख शहरों से यहाँ के लिए नियमित बसें (हिमाचल प्रदेश परिवहन विभाग सहित) और टैक्सियाँ चलती हैं। दिल्ली से मंदिर की दूरी लगभग 480-500 किमी है। ट्रेन द्वारा जाने के लिए सबसे नजदीकी बड़ा ब्रॉड-गेज रेलवे स्टेशन पठानकोट है। जो कि लगभग 120 किमी दूरी पर स्थित है। इसके अलावा, नैरो गेज के लिए ‘ज्वालाजी रोड (रानीताल)’ स्टेशन 20 किमी की दूरी पर है। पठानकोट से बस या टैक्सी द्वारा मंदिर आसानी से पहुँच सकते हैं। हवाई मार्ग से सबसे नजदीकी हवाई अड्डा गग्गल (कांगड़ा) है। जो मंदिर से लगभग 46 किमी दूर है। एयरपोर्ट से मंदिर जाने के लिए टैक्सी या बसें आसानी से मिल जाती हैं।


