-एमपी की दतिया सीट पर 6 हजार से ज्यादा मतों से जीते कांग्र्रेसी उम्मीदवार
-अपनी सत्ता वाले राज्यों में बीजेपी की हार से पार्टी के भवष्यि पर सवाल
हीरेन्द्र सिंह राठौड़/ नई दिल्लीः 03 अगस्त।
तीन विधानसभा क्षेत्रों के लिए हुए उपचुनाव के सोमवार को आए नतीजों ने भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय नेतृत्व की ‘मनमानी’ पर सवाल खड़े कर दिये हैं। बिहार में बीजेपी अपने राष्ट्रीय अध्यक्ष की परंपरागत बांकीपुर सीट पर ही उपचुनाव हार गई। दूसरी ओर मध्य प्रदेश में बीजेपी के दिग्गज नेता नरोत्तम मिश्रा की परंपरागत सीट पर कांग्रेस ने बीजेपी को जबरदस्त शिकस्त दी है।
30 जुलाई को हुए बिहार, मध्य प्रदेश और गुजरात की तीन विधानसभा सीटों में हुए उपचुनाव में बीजेपी में तीन में से दो सीटें हार गई है। वह भी तब, जबकि तीनों ही राज्यों में बीजपी की ही सरकारें हैं। बिहार की बांकीपुर सीट पर जनसुराज पार्टी के प्रशांत किशोर ने बीजेपी उम्मीदवार नीरज सिन्हा को 18 हजार 953 वोट से हरा दिया। वहीं एमपी की दतिया सीट पर कांग्रेस के घनश्याम सिहं ने बीजेपी के आशुतोष तिवारी को 6 हजार 16 वोट के अंतर से हराया है। सियासी जानकारों का कहना है कि सोमवार को आए बाई-इलेक्शन के नतीजों ने बीजेपी के केंद्रीय नेतृत्व के निर्णयों पर सवालिया निशान खड़े कर दिये हैं।
दूसरी पंक्ति के लोगों को मौका देने का प्रयास?
पार्टी के अंदर कुछ लोगों का कहना है कि बीजेपी नेतृत्व ने तीन राज्यों में तीन विधानसभा सीटों पर हुए उपचुनाव में पार्टी नेतृत्व ने अपने दूसरी पंक्ति के नेताओं को मौका देने का प्रयास किया था। कहा यह भी जा रहा है कि संघ और बीजेपी नहीं चाहते थे कि किसी भी नेता की हनक या वर्चस्व बरकरार रहे। इसलिए दतिया में डाॅ नरोत्तम मिश्रा का टिकट काटकर असुतोष तिवारी को चुनावी मैदान में उतारा गया था। नरोत्तम मिश्रा पूर्व की शिवराज सरकार में बहुत ज्यादा ताकतवर मंत्री रहे हैं और पार्टी नहीं चाहती थी कि राज्य की सरकार में सत्ता के दो केंद्र बनें। परंतु उपचुनाव से पहले और चुनाव के दौरान दोनों ही सीटों पर बीजेपी द्वारा प्रत्याशियों का चयन लगातार चर्चा में बना रहा।
दतिया सीट से तीन बार चुनाव जीते 6 बार के विधायक नरोत्तम मिश्रा
शिवराज सरकार में दमदर मंत्री रहे नरोत्तम मिश्रा 6 बार विधायक रह चुके हैं। वह मध्य प्रदेश की डबरा विधानसभा सीट से 1990, 1998 और 2003 विधायक चुने गये। इसके पश्चात नरोत्तम मिश्रा दतिया विधानसभा सीट से 2008, 2013 और 2018 में लगातार तीन बार विधानसभ चुनाव जीते हैं। 2023 के विधानसभा चुनाव में नरोत्तम मिश्रा कांग्रेस प्रत्याशी रााजेंद्र भारती के सामने चुनाव हा गये थे। हालांकि वह उपचुनाव की घोषणा होने से पूर्व ही इस क्षेत्र में बहुत ज्यादा सक्रिय हो गये थे। जिसकी वजह से क्षेत्र के ज्यादातर लोगों ने मान लिया था कि बीजेपी विधानसभा उपचुनाव में भी उन्हें ही अपना उम्मीदवार बायेगी।
1995 से है बांकीपुर सीट पर नितिन नबीन के परिवार का कब्जा!
बिहार की बांकीपुर सीट पर बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन के परिवार का कब्जा करीब 3 दशक पुराना है। 1995 में पहली बार उनके पिता नवीन किशोर प्रसाद सिन्हा बीजेपी के टिकट पर विधायक बने थे। इसके पश्चात वह वर्ष 2000, फरवरी 2005 और अक्टूबर 2005 में हुए विधानसभा चुनावों में भी विजयी रहे। तब इस सीट का नाम पटना पश्चिम हुआ करता था।
साल 2006 में नवीन किशोर प्रसाद सिन्हा की मृत्यु के पश्चात इस सीट पर हुए उपचुनाव में उनके पुत्र और वर्तमान में बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन पहली बार चुनाव जीतकर विधायक बने। इसके पश्चात 2008 में परिसीमन के पश्चात इस सीट का नाम बदलकर बांकीपुर रख दिया गया परंतु बीजेपी की जीत का सिलसिला बरकरार रहा। इसके पश्चात 2010, 2015, 2020 और 2025 के विधानसभा चुनाव में नितिन नवीन ने बांकीपुर सीट पर हुए विधानसभा चुनाव में लगातार जीत हासिल की। राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के पश्चात नितिन नबीन ने यह सीट छोड़ दी और 2026 में हुए उपचुनाव में पार्टी को प्रशांत किशोर के हाथों तगड़ी शिकस्त मिलने के साथ ही बीजेपी की जीत का सिलसिला भी टूट गया।
नामांकन के बाद उम्मीदवार बदलने के बावजूद बांकीपुर हार गई बीजेपी!
बिहार की चुनावी राजनीति में शायद पहली बार ऐसा हुआ जब किसी दल ने अपने एक उम्मीदवार के नामांकन पत्र दाखिल करने के बाद अपना उम्मीदवार बदल दिया। बांकीपुर सीट पर हुए उपचुनाव में पहले बजेपी ने अभिषेक बंटी को अपना उम्मीदवार बनाया था। अभिषेक बंटी ने 9 जुलाई को अपना नामांकन पत्र दाखिल कर दिया था। लेकिन अगले ही दिन नाटकीय घटनाक्रम में अभिषेक बंटी ने अपना नामांकन पारिवारिक कारणों को बताते हुए 10 जुलाई को वापस ले लिया था।
इसके पश्चात बीजेपी ने अपने मंडल अध्यक्ष नीरज सिन्हा को बांकीपुर सीट से अपना उम्मीदवार बनाया था। पार्टी ने शायद ऐसा इसलिए किया था कि इस सीट पर जनसुराज पार्टी के अध्यक्ष और भारीभरकम उम्मीदवार प्रशांत किशोर ने इस सीट से अपना नामांकन दाखिल कर दिया था। हालांकि सियासी जानकारों ने उस समय भी बीजेपी नेतृत्व के इस निर्णय पर सवाल उठाये थे कि कोई भारी-भरकम उम्मीदवार देने के बजाय पार्टी ने एसा उम्मीदवार दिया, जिसे पार्टी में ही ज्यादातर लोग नहीं जानते थे। जबकि प्रशांत किशोर की पहचान अंतरराष्ट्रीय स्तर की थी। यही कारण रहा कि बीजेपी मध्य प्रदेश और बिहार में अपनी दोनों परंपरागत सीटों पर हार गई।


