-हिमांचल प्रदेश के पालमपुर तहसील के अंतर्गत डाढ गांव में हैं मंदिर
हीरेन्द्र सिंह राठौड़/ कांगड़ा (हिमांचल प्रदेश): 6 जून।
हिमांचल प्रदेश के काँगड़ा में पालमपुर तहसील के अंतर्गत ‘दाढ़’ गांव में ‘शिव और शक्ति’ का एक अत्यंत प्राचीन और प्रसिद्ध संगम स्थल है। प्रसिद्ध पर्यटक स्थल धर्मशाला से यहाँ की दूरी करीब 15 किलोमीटर है! बनेर नदी के तट पर स्थित यह मंदिर करीब 700 साल पुराना माना जाता है और इसे श्रद्धालुओं द्वारा मनोकामना पूर्ण करने वाले प्रमुख तीर्थों में से एक माना जाता है। इस पवित्र मंदिर को 51 शक्तिपीठों में से एक माना जाता है। बताया जाता है कि इस स्थान पर देवी सती के चरण गिरे थे। यह स्थान देवी द्वारा चंड और मुंड नामक राक्षसों के वध के लिए भी पुराणों में प्रसिद्ध है।
ऐतिहासिक कथाः
चामुंडा देवी मंदिर का इतिहास कांगड़ा रियासत के कटोच वंश के राजा और एक पुजारी की गहरी आस्था से जुड़ा है। कठिन चढ़ाई से परेशान होकर, तत्कालीन राजा और उनके राजपुरोहित ने माता चामुंडा से एक आसान जगह पर आने की विनती की।
इस मंदिर का मूल स्थान बहुत ऊंचाई पर स्थित ‘आदि हिमानी चामुंडा’ है। दुर्गम पहाड़ियों के कारण 16वीं या 17वीं शताब्दी में एक राजा और पुजारी ने देवी से इसे नीचे लाने की प्रार्थना की। तब देवी ने स्वप्न में दर्शन देकर वर्तमान स्थान पर खुदाई करके मूर्ति निकालने का निर्देश दिया। तत्पश्चात पहले साधारण पत्थर समझने के कारण लोग मूर्ति उठा नहीं सके, लेकिन पुजारी द्वारा विधि-विधान से पूजा करने पर सफलता मिली।वर्तमान में यहाँ देवी चामुंडा के साथ-साथ भगवान शिव (नंदिकेश्वर के रूप में) विराजमान हैं।
माता चामुंदा के मुख्य मंदिर के पास ही संगमरमर की सीढ़ियों के माध्यम से भगवान शिव की एक गुफा है, जहाँ शिवलिंग स्थापित है! मंदिर के आस-पास धौलाधार पर्वतमाला और बनेर खड्ड (नदी) का मनमोहक प्राकृतिक दृश्य है।
पौराणिक पृष्ठभूमि एवं दानव वधः
मार्कण्डेय पुराण के अनुसार, देवी कौशिकी ने चंड और मुंड नामक असुरों का संहार किया था, जिसके बाद उन्हें ‘चामुंडा’ की उपाधि मिली। यहाँ यह मान्यता है कि खुद भगवान शिव ने माता चामुंडा को आशीर्वाद दिया था, इसलिए इस स्थान को शिव और शक्ति का निवास माना जाता है।
‘दुर्गा सप्तशती’ के अनुसार, शुम्भ और निशुम्भ नामक दैत्यों के अत्याचारों से मुक्ति पाने के लिए देवताओं ने देवी दुर्गा की आराधना की थी। तब देवी ने ‘कौशिकी’ के रूप में अवतार लिया। माता के रूप सौंदर्य पर मोहित होकर उन दैत्यों ने उन्हें पाने का प्रयास किया। युद्ध के दौरान देवी कौशिकी ने अपनी भृकुटि से एक उग्र शक्ति उत्पन्न की, जिसने दैत्यों के सेनापतियों चंड और मुंड का वध कर दिया।
अपनायें सड़क मार्ग का रास्ताः
चामुंडा नंदिकेश्वर धाम मंदिर की समुद्र तल से ऊंचाई लगभग 1,000 मीटर (लगभग 3,300 फीट) है और यहां सड़क मार्ग से आसानी से पहुंचा जा सकता है! जबकि आदि हिमानी चामुंडा मंदिर (मूल पहाड़ी मंदिर) की समुद्र तल से ऊंचाई 3,185 मीटर (10,450 फीट) है और यहाँ केवल ट्रेकिंग (पैदल यात्रा) द्वारा ही पहुंचा जा सकता है!


