‘यूजीसी रूल्स’ के खिलाफ बढ़ रहा देश भर में रोष, क्षत्रिय मंच ने की कानून को वापस लेने की मांग

-‘नये नियम लागू होने से होगा सवर्ण छात्रों का उत्पीड़नः रमेश राघव
-एससी/एसटी एक्ट के दुरूपयोग से ही नहीं उबर पा रहा सवर्ण समाजः हीरेंद्र राठौड़

एसएस ब्यूरो/ नई दिल्लीः 27 जनवरी।
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के नये नियमों (UGC Rules) को लेकर देशभर के सवर्ण समाज में रोष बढ़ता जा रहा है। अखिल भारतीय क्षत्रिय मंच (ABKM) ने इस पर कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। क्षत्रिय मंच के नेताओं ने कहा कि यूजीसी की लागू या प्रस्तावित नीतियां उच्च शिक्षा तंत्र, शिक्षकों, शोधार्थियों और विद्यार्थियों के भविष्य पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकती हैं। इससे शिक्षा की गुणवत्ता, पारदर्शिता और समान अवसर के अधिकारों को गंभीर क्षति पहुंचने की आशंका है।
क्षत्रिय मंच के राष्ट्रीय संयोजक ठाकुर रमेश सिंह राघव ने कहा कि यूजीसी के नये रूल्स लागू होने से सवर्ण समाज के छात्रों का उत्पीड़न बढ़ने की आशंका है। इससे छोटे-छोटे विवाद भी बड़ा और घातक रूप ले सकते हैं। इसका उपयोग किये जाने के बजाय दुरूपयोग ज्याद होगा। क्योंकि इस तरह के ज्यादातर मामलों में पहले जांच के बजाय पहले कार्रवाई की आशंका हमेशा बनी रहती है।
क्षत्रिय मंच के राष्ट्रीय महामंत्री हीरेन्द्र सिंह राठौड़ ने कहा कि इसी तरह के एससी/एससी एक्ट का दुरूपयोग जमकर किया जा रहा है। पिछले कुछ वर्षों में यह बात पूरी तरह से सामने आ चुकी है कि इस कानून की आड़ में सवर्ण समाज का जमकर उत्पीड़न किया जा रहा है। सवर्ण समाज पहले ही एससी/एसटी एक्ट की मार से उबर नहीं पाया है। ऐसे में सवर्ण समाज के छात्रों के ऊपर यीजीसी रूल्स की एक और तलवार लटका दी गई है।
क्षत्रिय मंच ने इस बात पर जोर दिया कि शिक्षा किसी भी राष्ट्र की रीढ़ होती है और इसमें असंतुन या जल्दबाजी में लिए गए निर्णय दीर्घकालिक नुकसान पहुंचा सकते हैं। यूजीसी के वर्तमान निर्णयों को लेकर देशभर में शिक्षाविदों, छात्रों और सामाजिक संगठनों के बीच गहरी चिंता और असंतोष है।
अखिल भारतीय क्षत्रिय मंच ने केंद्र की मोदी सरकार से मांग की है कि विद्यालयों जैसी संस्थाओं को जाति, धर्म या लिंग के आधार पर छात्रों को बांटने से बचना चाहिए। जब कोई छात्र विद्यालय जाता है, तो वह केवल एक विद्यार्थी होता है। इस विषय पर महान शिक्षाविदों और शोध छात्रों से भी राय लेने की आवश्यकता है।
क्षत्रिय मंच ने सरकार से मांग की है कि यूजीसी से संबंधित विवादित नीतियों/प्रस्तावों पर पुनर्विचार किया जाये। शिक्षकों, छात्रों एवं विशेषज्ञों से व्यापक परामर्श किया जाये। उच्च शिक्षा की स्वायत्तता, गुणवत्ता एवं समानता को प्राथमिकता दी जाये और शिक्षा व्यवस्था को व्यवसायीकरण से मुक्त रखते हुए जनहित में निर्णय सुनिश्चित किया जाये।