-शिवसेना के बाद अकाली दल ने छोड़ा बीजेपी का साथ
-जेडीयू व एलजेपी के साथ पहले ही डांवाडोल स्थिति
एसएस ब्यूरो/ नई दिल्ली
भारतीय जनता पार्टी के लिए सहयोगी दलों को साथ रख पाना बड़ी चुनौती बनता जा रहा है। शिवसेना ने महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के बाद राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) छोड़ दिया था। अब शिरोमणि अकाली दल (बादल) ने बीजेपी के साथ गठबंधन खत्म करते हुए एनडीए को छोड़ दिया है। इसकी वजह बना है किसानों का मुद्दा।
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कुछ दिन पहले ही अकाली दल ने संसद में लाए गए कृषि संबंधी विधेयकों को लेकर सरकार छोड़ दी थी और अब उसने राजग से अलग होने की घोषणा कर दी है। अकाली दल का अलग होना भाजपा के लिए एक बड़ा झटका है, क्योंकि उसके सबसे विश्वस्त सहयोगियों में शामिल दो प्रमुख दल शिवसेना और अकाली दल अब तक अलग हो चुके हैं।
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अकाली दल के शीर्ष नेता प्रकाश सिंह बादल अधिकांश मौकों पर कहा करते थे कि भाजपा व अकाली दल का रिश्ता नाखून और मांस का है जो कभी अलग नहीं हो सकता है, लेकिन अब दोनों दल अलग रास्ते पर चल पड़े हैं। अकाली दल ने इसके लिए भाजपा को जिम्मेदार ठहराया है। पार्टी के अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल ने कहा है कि जब किसानों के मुद्दे पर केंद्र सरकार ने विरोध के बावजूद संसद में बिल लाने का फैसला किया तब उसने सरकार छोड़ दी थी। राजग से अलग होने के पहले उन्होंने पार्टी की बैठक में अपने सभी कार्यकर्ताओं और किसानों से चर्चा की, उसके बाद फैसला किया।
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माना जा रहा है कि भाजपा के लिए अपने सहयोगियों के बीच विश्वास कायम रख पाना चुनौती बनता जा रहा है। शिवसेना उससे पहले ही अलग हो चुकी है। जनता दल यूनाइटेड के साथ उसके रिश्ते खट्टे मीठे रहे हैं। जेडीयू एक बार बीजेपी का साथ छोड़ कर चला भी गया था। रामविलास पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी के साथ भी बीजेपी की स्थिति डवांडोल बनी हुई है।
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सियासी जानकारों का कहना है कि इस समय भाजपा को भले ही सहयोगी दल इतने महत्वपूर्ण नहीं लग रहे हों क्योंकि केंद्र में उसकी अपने दम पर सरकार है। कई राज्य में उसकी अपनी सरकार हैं, लेकिन भविष्य के लिए उसको भरोसेमंद मजबूत साथी मिलना मुश्किल हो सकते हैं। क्योंकि उसके सबसे पुराने और मजबूत सहयोगी दलों में दो प्रमुख पार्टियां उससे अलग हो चुकी हैं। जो कहीं ना कहीं विचारधारा के स्तर पर भी उसके साथ थीं।
भाजपा के लिए अकाली दल का अलग होना इसलिए भी एक बड़ी चुनौती है क्योंकि वह किसानों के मुद्दे पर अलग हुआ है। किसानों का मुद्दा एक ऐसा मुद्दा है जो चुनाव को प्रभावित करता है। अब जबकि बिहार के विधानसभा चुनाव और विभिन्न राज्यों में होने वाले उपचुनाव सामने हैं। तब अकाली दल का किसानों के मुद्दे पर जाना उसके लिए मुसीबत बन सकता है। हालांकि भाजपा नेता किसानों के बीच तथ्य रखने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन सड़कों पर उतरे किसान बीजेपी के राजनीतिक माहौल के लिए समस्याएं खड़ी कर रहे हैं।
अकाली दल 1998 से था एनडीए का हिस्सा
वर्ष 1998 में जब लालकृष्ण आडवाणी और अटल बिहारी वाजपेयी ने एनडीए बनाने का फैसला किया था, तो उस वक्त जॉर्ज फर्नांडीज की समता पार्टी, जयललिता की अन्नाद्रमुक, प्रकाश सिंह बादल के नेतृत्व वाला अकाली दल और बाला साहेब ठाकरे की शिवसेना इस गठबंधन में शामिल हुए थे। समता पार्टी का बाद में नाम बदलकर जेडीयू हो गया। जेडीयू और अन्नाद्रमुक एनडीए से एक बार अलग होकर वापसी कर चुके है। शिवसेना अब कांग्रेस के साथ है। अकाली दल ही ऐसी पार्टी थी, जिसने अब तक एनडीए का साथ नहीं छोड़ा था।
कृषि विधेयक बने अकालियों के गले की फांस
अकाली दल के लिए मोदी सरकार के कृषि विधेयक गले की फांस बन गये थे। क्योंकि पार्टी को लग रहा था कि अगर वह सरकार के साथ गए तो पंजाब के बड़े वोट बैंक किसानों से उसे हाथ धोना पड़ेगा। पंजाब के कृषि प्रधान क्षेत्र मालवा में अकाली दल की पकड़ है। अकाली दल को 2022 के विधानसभा चुनाव दिखाई दे रहे हैं। 2017 से पहले अकाली दल की राज्य में लगातार दो बार सरकार रही है। 2017 के विधानसभा चुनाव में 117 सीटों में से अकाली दल को महज 15 सीटों पर जीत हासिल हो पाई थी। ऐसे में 2022 के चुनाव से पहले अकाली दल किसानों के एक बड़े वोट बैंक को अपने खिलाफ नहीं करना चाहता है।